अर्थात्: सच्ची विद्या वही है जो अज्ञान, संकीर्णता और दुर्गुणों से मुक्त कर आत्मा को उन्नत बनाए।
एक ऐसे समाज का निर्माण करना जहाँ आने वाली पीढ़ियां सनातन संस्कारों से सुशोभित हों, अपने धर्म व संस्कृति पर गर्व करें, माता-पिता और गुरुजनों के प्रति कृतज्ञ रहें और विद्या के बल पर समाज व राष्ट्र को सशक्त बनाएं।
बालकों को सात्विक, भयमुक्त, अनुशासित और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करना; जहाँ वे वेदों के उदात्त मंत्रों के साथ-साथ गणित, विज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान में निष्णात होकर एक आदर्श नागरिक बन सकें।
गुरुकुल में विद्यार्थी के पांचों स्तरों का सम्यक पोषण होता है
शुद्ध सात्विक देशी आहार एवं सुदृढ़ शरीर।
प्राणायाम, सूर्य नमस्कार एवं जीवनी शक्ति का विकास।
मंत्र जाप, ध्यान एवं मानसिक एकाग्रता व शांति।
विवेक, शास्त्र ज्ञान एवं तार्किक समझ।
भक्ति, सेवाभाव एवं आत्मिक प्रसन्नता।